सूरह नास (Surah Nas in Hindi) — अरबी, हिंदी तर्जुमा और तफ़सीर

सूरह नास क़ुरआन की अंतिम और 114वीं सूरह है, जो मक्का मुक़र्रमा में नाज़िल हुई। यह छोटी मगर बहुत असरदार सूरह है, जिसमें केवल छह आयतें हैं। इसमें इंसान अल्लाह ﷻ से पनाह माँगता है—शैतान के वसवसों, छुपी हुई बुराइयों और दिल पर असर डालने वाली अदृश्य ताक़तों से बचने के लिए। इसमें अल्लाह ﷻ को “रब्बुन-नास” (पालनहार), “मलिकुन-नास” (बादशाह) और “इलाहुन-नास” (माबूद) कहा गया है, जिससे यह साफ़ हो जाता है कि असली हिफ़ाज़त और हुकूमत सिर्फ उसी के पास है।

मुसलमान अपनी रोज़मर्रा की इबादतों में सूरह नास को अक्सर सूरह फ़लक़ और सूरह इख़लास के साथ पढ़ते हैं। इन्हें “मुअव्विज़तैन” कहा जाता है। नमाज़ के बाद, सुबह-शाम के अज़्कार में और सोने से पहले इनकी तिलावत करना सुन्नत है। सूरह नास हमें यह एहसास कराती है कि हमारी असली पनाह और सुरक्षा सिर्फ अल्लाह ﷻ ही देता है, वही इंसान का मालिक और माबूद है।

सूरह नास का अरबी टेक्स्ट (Arabic Text)

قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ ۝

(कहो: मैं इंसानों के पालनहार की पनाह चाहता हूँ)

مَلِكِ النَّاسِ ۝

(इंसानों के मलिक और असली हाकिम की पनाह)

إِلَٰهِ النَّاسِ ۝

(इंसानों के इलाह, सच्चे माबूद और इबादत के हक़दार की पनाह)

مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ ۝

(उस शैतान से बचाव, जो दिलों में वसवसा डालता और फिर पीछे हट जाता है)

الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ ۝

(जो इंसानों के दिलों में संदेह और गुमराही फूँकता है)

مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ ۝

(चाहे वह जिन्नात में से हो या इंसानों में से)

सूरह नास हिंदी में तर्जुमा (Transliteration in Hindi style)

कहो: मैं इंसानों के पालनहार (रब्बुन-नास) की पनाह चाहता हूँ, इंसानों के मालिक और असली हाकिम (मलिकुन-नास) की पनाह, इंसानों के सच्चे माबूद और इबादत के हक़दार (इलाहुन-नास) की पनाह।

उस शैतान से,
जो दिलों में वसवसा डालता और फिर पीछे हट जाता है,
जो इंसानों के सीने में शंका और गुमराही पैदा करता है,
चाहे वह जिन्नात में से हो या इंसानों में से।

सूरह नास का मतलब और संदर्भ

सूरह नास हमें यह याद दिलाती है कि असली पनाह और हिफ़ाज़त सिर्फ़ अल्लाह ﷻ से ही मिलती है। इसमें तीन बार अल्लाह की सिफ़तें ज़िक्र की गई हैं—रब्बुन-नास (पालनहार), मलिकुन-नास (बादशाह और हाकिम) और इलाहुन-नास (माबूद और इबादत के हक़दार)। यह दोहराव इस बात पर ज़ोर देता है कि वही मालिक है, वही हुकूमत करता है और वही इबादत के योग्य है।

यह सूरह सिखाती है कि इंसान को हर बुराई से पनाह माँगनी चाहिए—चाहे वह शैतान के वसवसे हों, छुपी हुई बुराइयाँ हों या दिलों में उठने वाली शंका और गुमराही

हदीसों में आता है कि जब नबी ﷺ पर जादू और शैतानी असर डाला गया, तो अल्लाह ﷻ ने सूरह नास और सूरह फ़लक़ उतारीं। इन्हें मुअव्विज़तैन कहा जाता है और यह दोनों सूरहें हर तरह की बुराई, हसद और नज़र-ए-बद से बचाव की मज़बूत ढाल हैं।

सूरह नास पढ़ने के फ़ायदे

सूरह नास की तिलावत इंसान को अल्लाह ﷻ की रहमत और हिफ़ाज़त में ले आती है। यह शैतान के वसवसों, नज़र-ए-बद, हसद और जादू-टोने से बचाव की ढाल है। सहीह हदीस में आता है कि नबी ﷺ अक्सर सूरह नास को सूरह फ़लक़ और सूरह इख़लास के साथ पढ़ते थे और इन्हें सुबह-शाम के अज़्कार और सोने से पहले की दुआओं में शामिल करते थे।

इसकी तिलावत दिल को सुकून देती है, ख़ौफ़ और वहम को मिटाती है, और इंसान के तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा) को और मज़बूत करती है। यह बच्चों और बड़ों दोनों के लिए रूहानी हिफ़ाज़त, बरकत और दिल के चैन का ज़रिया है।

कब और कैसे पढ़ें सूरह नास?

सूरह नास की तिलावत रोज़ाना ज़िंदगी में कई मौकों पर सुन्नत और बरकत से भरपूर अमल है। नबी ﷺ इसे अक्सर सूरह फ़लक़ और सूरह इख़लास के साथ पढ़ते थे। सहीह हदीस में बताया गया है कि इन तीनों सूरहों को हर नमाज़ के बाद, सुबह-शाम के अज़्कार में और सोने से पहले पढ़ना मुस्तहब है और यह दिल को सुकून देने वाला अमल है।

बीमारी, ख़ौफ़ या वहम की हालत में और बच्चों की हिफ़ाज़त के लिए भी सूरह नास पढ़ी जाती है। इसे पढ़कर दम (फूँक मारना) करना और खुद पर या बच्चों पर पढ़ना सुन्नत तरीक़ा है। हदीस से साबित है कि अल्लाह ﷻ इस अमल से अपनी रहमत, बरकत और हिफ़ाज़त नाज़िल करता है और इंसान को दिल का चैन अता करता है।

FAQs – सूरह नास से जुड़े आम सवाल

सूरह नास इंसान को शैतान के वसवसों, नज़र-ए-बद, हसद और जादू-टोने जैसी अदृश्य बुराइयों से बचाकर अल्लाह ﷻ की पनाह में ले आती है।
हाँ, सूरह नास को हर नमाज़ के बाद पढ़ना मुस्तहब और बरकत वाला अमल है। यह नबी ﷺ से साबित सुन्नत है।
क्योंकि दोनों को मिलाकर मुअव्विज़तैन कहा जाता है। इन्हें साथ पढ़ने से हर तरह की बुराई, जादू और शैतानी असर से हिफ़ाज़त की दुआ की जाती है।
जी हाँ, बच्चों की रूहानी हिफ़ाज़त और बरकत के लिए सूरह नास पढ़कर दम करना नबी ﷺ का सुन्नत तरीक़ा है।
सुबह-शाम के अज़्कार, हर नमाज़ के बाद और सोने से पहले सूरह नास पढ़ना सबसे अफ़ज़ल और दिल को सुकून देने वाला अमल है।

Mohammed Basheer

Mohammed Basheer is the founder of Sukoonly.com, an Islamic blog focused on duas, prophetic healing, and Qur’anic wisdom. He writes with sincerity and spiritual depth for seekers around the world.